जांजगीर-चाम्पा. जिले के एक छोटे से गांव बहेराडीह में स्थित देश के पहले किसान स्कूल, जहां पर बनाई जा रही सब्जी, फल फूल की बीजों की सीड बॉल, जिसका वितरण लोगों को 5 जून को अंतर्राष्ट्रीय पर्यावरण दिवस के अवसर पर किया जाएगा और सीड बॉल अभियान का शुभारम्भ किया जाएगा. इस अभियान में किसान, स्कूली बच्चे, बिहान की दीदियां, सामाजिक संगठन के लोग और जनप्रतिनिधि शामिल होंगे.
इस सम्बन्ध में वरिष्ठ पत्रकार कुंजबिहारी साहू किसान स्कूल बहेराडीह के संचालक दीनदयाल यादव ने बताया कि सीड बॉल पर्यावरण संरक्षण, हरियाली बढ़ाने और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण का एक सरल एवं प्रभावी माध्यम है. वर्षा ऋतु में सीड बॉल अभियान चलाकर बड़े स्तर पर पौधरोपण किया जा सकता है. इस अभियान का शुभारम्भ 5 जून को अंतर्राष्ट्रीय पर्यावरण दिवस के अवसर पर सुबह 10 बजे वरिष्ठ पत्रकार कुंजबिहारी साहू किसान स्कूल बहेराडीह से किया जाएगा. किसान स्कूल के संचालक दीनदयाल यादव ने बताया कि सीड बॉल बनाने के लिए उपजाऊ मिट्टी, गोबर या वर्मी कम्पोस्ट, सब्जी, फल या फूल की बीज और पानी जरुरत होती है. इसे बनाने के लिए सबसे पहले 5 भाग मिट्टी 2 भाग गोबर या वर्मी कम्पोस्ट आवश्यक मात्रा में बीज का मिश्रण करके गेंद बनाकर दो दिन छाया में सुखाना होता है और बारिश के मौसम में खेत, जंगल, पहाड़ी या खाली भूमि पर फेकना होता है. इसके लिए नीम, आम, जामुन, तेन्दु, करंज, गुलमोहर, इमली, मुनगा, व अन्य बीज शामिल कर सकते हैं.

पर्यावरण में सीड बॉल का महत्व
किसान स्कूल के संचालक दीनदयाल यादव ने बताया कि पर्यावरण में सीड बॉल का बहुत ही बड़ा महत्व है. जैसे वनों की वृद्धि, मिट्टी संरक्षण, जैव विविधता संरक्षण, जल संरक्षण, वायु शुद्धिकरण, जलवायु परिवर्तन नियंत्रण, कम लागत एवं आसान तकनीक आदि शामिल है, वहीं इसके लाभ के बारे में बताया कि पौधों की सुरक्षा बढ़ती है. पक्षियों और चीटियों से बीज सुरक्षित रहतीं है. पानी की कम आवश्यकता, सूखे क्षेत्रो में भी उपयोगी, सामूहिक अभियान में आसान उपयोग कर सकते हैं.

क्या है सीड बॉल…
किसान स्कूल के संचालक दीनदयाल यादव ने बताया कि यह एक छोटी गेंद होती है, जिसे मिट्टी, गोबर वर्मी कम्पोस्ट और बीज मिलाकर बनाई जाती है. इसका उपयोग पौधों और पेड़ों के बिजों को सुरक्षित तरीके से उगाने के लिए किया जाता है. बारिश होने पर यह गेंद धीरे धीरे गल जाती है और बीज अंकुरित होकर पौधा बन जाता है. इसे सीड बम भी कहा जाता है. यह प्राकृतिक खेती और पर्यावरण संरक्षण की एक सरल एवं कम लागत वाली तकनीक है.

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